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एक महिला का ग़जब आईडिया – पंद्रह हज़ार रुपए से करोड़ों की कंपनी का सफर

प्रकृति ने हमें अपने उपयोग करने के लिए पर्याप्त संसाधन दिए हैं । उन कीमती रत्नों में से कुछ सामग्री छिपी हुई है, जिन्हें हम अक्सर किसी काम का नहीं मानते हैं। लेकिन लगन और त्याग, बेकार की वस्तुओं को पहचानने और उसका उपयोग करने के लिए विशेष प्रतिभा देता है और उन्हें सोने में बदल देता है। आज हम ऐसे ही उद्यमी महिमा मेहरा और विजेंद्र शेखावत की बात करेंगे जिन्होंने ऐसा ही किया है।

जयपुर में हाथी के गोबर पर फिसलने से शुरआत

मात्र १५,000 रुपये के ऋण के साथ शुरू करते हुए, उन्होंने हाथी के गोबर को अपने कच्चे माल के रूप में चुना और एक ऐसा व्यवसाय बनाया, जिसका कारोबार अब करोड़ों रुपये में चलता है। हाँ, हो गए न आप हैरान ।
शुरुआत 2003 से होती है जब दोनों जयपुर गए, जहां वे जयपुर में आमेर किले के पास रेशेदार गोबर के ढेर पर फिसल गए। दशकों तक लोगों ने इसे नजरअंदाज किया लेकिन उन्होंने इसमें अपार संभावनाएं देखीं और इसमें से कागज बनाने का फैसला किया।

अगर आप इनके ब्रांड हाथी छाप के उत्पादों पर एक नज़र डालेंगे , तो आपका गोबर को देखने का तरीका बदल जाएगा। वे नोटबुक, फोटो एलबम, फ्रेम, बैग, गिफ्ट टैग, स्टेशनरी से लेकर चाय के कोस्टार तक बनाते हैं और हर चीज की कीमत 10 रुपये से लेकर 500 रुपये तक रखते हैं।

बहुत सोच विचार कर, इन्होने इस व्यवसाय को करने का फैसला किया। जो काफी चुनौतीपूर्ण था। ज्यादातर व्यवसाय पहले देश में स्थापित होते हैं और बाद में विदेश में निर्यात करते हैं। महिमा ने अपना पेपर जर्मनी को निर्यात करने से शुरुआत की और इसे चार साल तक किया, उसके बाद उन्होंने भारतीय बाजार में कदम रखा। इनके उत्पाद यूनाइटेड किंगडम के बाजार में भी मिलता है।

इस बिज़नेस में, गोबर की सफाई सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक है। गोबर को, पानी की बड़ी टंकियों में अच्छी तरह से धोया जाता है। गोबर के पानी का उपयोग खेत में उर्वरकों के रूप में किया जाता है, और गोबर को सुखाया जाता है और कागज के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है।

परिवार का विरोध

शेखावत कहते हैं, “मेरी माँ गोबर को घर में लाने के विचार से सन्न हो गई थीं । उन्होंने दावा किया कि मेरे बिज़नेस के कारण कोई मुझसे कभी शादी नहीं करेगा। ”

महिमा बचपन से ही, इको-फ्रेंडली तरीकों से जीवन जीना पसंद करती थीं । शायद यही कारण था कि उन्होंने हाथी के गोबर को एक उपयोगी संसाधन के रूप में पहचान देने में मदद की। हाथी छाप में, ग्रामीणों की एक छोटी टीम है जो गोबर को प्रोसेस करके उससे कागज बनाते हैँ। हाथी के पास स्पष्ट रूप से एक खराब पाचन तंत्र होता है, जो उनके गोबर को अत्यधिक रेशेदार बनाता है, जिसके परिणामस्वरूप अच्छी गुणवत्ता का कागज बनता है, जिससे उनके कागज की क्वालिटी बहुत ही अच्छी रहती है।

Eco-Friendly तरीके से निर्माण

वे अपने उत्पाद को बनाने में बहुत ही उन्नत तकनीक उपयोग में लाते हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. उनकी इस पहल से , हरा और रासायनिक मुक्त कागज बन रहा है, जो कि बहुत शानदार उत्पाद होता है।

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